क़िस्मत की नाव कब किस किनारे पर रुक जाए इसका कोई ठिकाना नहीं होता। मतलब क़िस्मत जब भी कुछ देती है तो छप्पर फाड़ कर देती है। हक़ीक़त में यह घटना यमन देश के मछुआरे फारेस अब्दुल हकीम के साथ हुई ,जो उन्हें समुद्र में तैरता हुआ खज़ाना मिल गया। चलिए जानते हैं इस रोचक घटना के बारे में।

क़िस्मत ने दिया साथ – कहते हैं आपकी क़िस्मत में जो लिखा होता है आपकी क़िस्मत आपको वहां पहुंचा ही देती है। कुछ यूं ही मछुआरे फारेस अब्दुल हकीम के साथ भी हुआ। फारेस आमतौर पर मछली पकड़ने सागर के पूर्वी तटों पर जाया करते थे ,लेकिन उस दिन हवा अनुकूल ना होने पर वह पश्चिमी तटों के क़रीब जा पहुंचे। फारेस इस बात से बिल्कुल अनजान थे उनके हाथ उनकी ज़िंदगी बदलने वाली कुंजी लगने लगने वाली है। यमन देश एक गृह युद्ध ग्रस्त और ग़रीब देश है। वहां के लोग जीवन यापन के लिए मुख्य रूप से मछलियों पर ही निर्भर है।

नज़र आया खज़ाना- अब्दुल हकीम जब नौका के साथ 26 किलोमीटर आगे जा पहुंचे तो उन्हें वहां आगे एक विशाल पत्थर सा कुछ तैरता नज़र आया। नज़दीक जाकर देखा तो एक विशालकाय व्हेल मछली थी जो मर चुकी थी। बड़ी मशक्कत के बाद वह मछली को किनारे पर ले आए।जब उन्होंने मछली का पेट चीरा तो उनकी आंखें खुली की खुली रह गई। मछली के पेट से 126 किलोग्राम ऐंबरग्रीस निकला। आपकी जानकारी के लिए बता दूं ऐंबरग्रीस एक बेहद दुर्लभ पदार्थ होता है जो व्हेल मछली के अपशिष्ट पाचन पदार्थों से बनता है। इसे व्हेल वोमिट के नाम से भी जाना जाता है। यह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में काफ़ी ऊँची क़ीमत में बिकता है। इसे इत्र बनाने और कई तरह से उपयोग में लाया जाता है।

मेहनत का फल मिला- फारेस अब्दुल हकीम को उनकी मेहनत का फल मिला। उनके द्वारा ढूंढे गए ऐंबरग्रीस की क़ीमत क़रीब ₹ 11 करोड़ लगी। फारेसने उन पैसों से अपने लिए एक नाव खरीदी ,एक घर बनवाया और कुछ पैसे रखकर बाक़ी ज़रूरतमंदों में बांट दिए । अब फारेस एक सुकून की ज़िंदगी जी रहे हैं ।

क्या होता है ऐंबरग्रीस – ऐंबर ग्रीस मुख्य रूप से व्हेल मछली की उल्टी से बनता है। जब मछली अपने भोजन को ठीक ढंग से नहीं पचा पाती तो उसे उगल देती है, जिससे यह विशेष प्रकार के अपशिष्ट पदार्थ से मिलकर बनता है। परफ्यूम इंडस्ट्री में इसका उपयोग ख़ुशबू को बनाने और गंध को लंबे समय तक बरक़रार रखने के लिए किया जाता है। वैज्ञानिकों द्वारा इसे स्विमिंग गोल्ड यानी तैरता सोना कहा जाता है।

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