हिंदू धर्म में शादी को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। शादी के बाद एक सुहागन स्त्री के जीवन में श्रृंगार जैसे सिंधूर, मेहंदी, बिंदी जैसी चीजें बहुत मायने रखती हैं। हिंदू जाति में यह श्रृंगार सुहागन स्त्री के सुहाग का प्रतीक माना जाता है। स्त्रियां अपने पति के लंबी उम्र के लिए सोलह सिंगार करती हैं और व्रत रहती हैं। लेकिन एक ऐसा भी समुदाय है जहां की महिलाएं पति के जीवित रहने के बावजूद भी हर साल कुछ समय के लिए विधवाओं की जिंदगी जीतीे हैं।

इस समुदाय का नाम है गछवाहा समुदाय। इस रीति रिवाज को लंबे समय से इस समुदाय की महिलाएं निर्वाह करती आ रही हैं। यहां की महिलाएं अपने पति के लंबी उम्र के लिए हर साल विधवाओं की जिंदगी जीती हैं।

गछवाहा समुदाय के लोग मुख्यतः पूर्वी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। यहां के आदमी पेड़ों से ताड़ी उतारने का काम करते हैं। जब वह पेड़ से ताड़ी उतारने के लिए जाते हैं तब उनकी महिलाएं विधवा की जिंदगी जीती है। वह श्रृंगार नहीं करती, वह न तो सिंदूर लगाती हैं न बिंदी लगाती हैं। यहां तक कि वह उदास भी रहती हैं।

कुल देवी को अर्पित करती हैं अपना श्रृंगार का सामान-:
गछवाहा समुदाय तरकुलहा देवी को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। जिस समय आदमी ताड़ी उतारने के लिए जाता है उस समय महिलाएं अपना श्रृंगार का सामान मंदिर में रख आती है। उनका यह मानना है कि ताड़ का पेड़ काफी ऊंचा होता है और जरा सी चूक व्यक्ति की मौत का कारण भी बन सकता है। इसलिए यहां की महिलाएं मंदिर में श्रृंगार का सामान रख अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती है।

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