किसान परिवार के बेटे ने तय किया सिपाही से लेकर भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट तक का सफर, 50 रूपए के लिए करते थे 12 घंटे काम

बालबांका तिवारी बिहार के आरा जिले के रहने वाले हैं, जिन्होंने अपने परिवार के साथ साथ पूरे गांव का नाम रोशन किया है। एक सिपाही से लेकर भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट तक का सफर तय करने वाले बालबांका ने यह साबित कर दिया कि यदि मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ कोई काम किया जाए तो उसमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने कभी भी अपनी जीवन की कठिनाइयों को मार्ग का रोड़ा बनने नहीं दिया। इतने कम समय में उन्होंने जिस तरह से अपने दृढ़ संकल्प के साथ काम किया वह कोई साधारण बात नहीं है।

भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट बालबांका तिवारी के पिता का नाम विजय शंकर तिवारी है, जिन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान कहा है कि उनके बेटे ने अपने जीवन में काफी संघर्ष का सामना किया और उसका यह नतीजा है कि आज वह भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट के पद पर हैं। बालबांका बचपन से ही पढ़ाई में एक तीव्र बुद्धि और मेहनती किस्म के विद्यार्थी थे। पढ़ाई में उनकी विशेष रूचि थी और वह खुद पर भरोसा भी करते थे। बालबांका एक किसान परिवार के अंतर्गत आते हैं जिसके कारण उनके परिवार में प्रारंभिक समय से ही पैसों की तंगी रही। यही कारण था कि बालबांका को अपने पढ़ाई के खर्च निकालने के लिए कई जगह ट्यूशन भी पढ़ाना पड़ता था। केवल ट्यूशन ही नहीं बल्कि फैक्ट्री में भी काम करके उन्होंने अपने पढ़ाई को जारी रखा और उस मुकाम तक जा पहुंचे जिसकी किसी ने आशा भी न की थी।

50 से 100 रुपए के लिए 12-12 घंटे तक करते थे काम:
बालबांका के पिता विनय शंकर तिवारी ने बालबांका के जीवन में संघर्षों के बारे में बताया कि जब वह उड़ीसा में एक नमकीन फैक्ट्री में काम करते थे तब उनका बेटा भी उनके साथ गया था। परिवार का भरण पोषण करने के लिए काम करना बेहद जरूरी था क्योंकि घर में उनके अलावा अन्य कोई भी काम करने वाला नहीं था। हालांकि ऐसे में लोग हार जाते हैं और अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ देते हैं लेकिन बालबांका ने ऐसा बिल्कुल नहीं किया। उन्होंने काम के साथ-साथ अपनी पढ़ाई को भी जारी रखा और आर्थिक रूप से परिवार की सहायता भी की। 16 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने नौकरी करना शुरू कर दिया था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी बुरी थी कि उन्होंने 50 से 100 रुपए के लिए दिन में 12-12 घंटे तक काम किया है। बालबांका के परिवार वालों ने उन्हें काफी संघर्ष करते हुए देखा है कि किस तरह से बालबांका ने बिना किसी से आर्थिक सहायता लिए और अपने परिवार की मदद करते हुए कठिन मेहनत और बुलंद इरादे के बल बूते पर आज ऊंचाई के इस शिखर पर अपना कदम रखा है।

12वीं पास करने के बाद उड़ीसा के राउरकेला में नमकीन फैक्ट्री में किया काम:
बालबांका के पिता ने बताया कि 2008 में बालबांका ने मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद 12वीं कक्षा पास करके उड़ीसा के राउरकेला अपने पिता के साथ चले गए और वहां उन्होंने नमकीन फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया। वहीं रहकर उन्होंने अपने इंटर की पढ़ाई भी जारी रखी और 2010 में परीक्षा पास की। उन्होंने भारतीय मिलिट्री एकेडमी (IMA) से ग्रेजुएशन की पढ़ाई को भी पूरा किया।

केवल 28 वर्ष की उम्र में बालबांका बने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट:
भारतीय सेना में पासिंग आउट परेड पास कर 28 वर्ष की उम्र में बालबांका ने 2012 में सेना में सिपाही के रूप में कार्य किया, जहां उनकी पोस्टिंग भोपाल में सेना ईएमई के केंद्र में हुई। 4 साल काफी मेहनत करने के बाद उन्होंने आइएमए की परीक्षा दी और दूसरे ही प्रयास में सफल भी हो गए। उन्होंने 5 वर्षों तक सिपाही के रूप में काम किया। इसके बाद वे आर्मी कैडेट कॉलेज की पढ़ाई भी जारी रखें और अंत में 2017 में उन्हें सफलता मिल गई। इसके साथ ही वे एसीसी में भर्ती हो गए। इसके बाद उन्हें आर्मी ऑफिसर का पद मिला और 28 वर्ष की उम्र तक वे आर्मी में लेफ्टिनेंट बन गए। बालबांका के इस सफलता पर उनके घरवाले काफी खुश हैं। उन्होंने आज अपने कठिन मेहनत और प्रयास के बल पर जिस तरह से सफलता की ऊंचाइयों को छुआ है, उससे उनके परिवार और गांव में जश्न का माहौल बना हुआ है।

भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनकर घर के साथ-साथ पूरे जिले का नाम किया रोशन:
बालबांका के चाचा कृपा शंकर तिवारी का कहना है कि उनके भतीजे अर्थात बालबांका ने पढ़ाई में जिस तरह से अपनी रूचि लगाई थी कि उन्हें इस बात का पूरा भरोसा था कि वह भविष्य में एक अच्छे मुकाम पर होंगे और आज वह भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर बैठे हैं। बालबांका ने अपने सपने को पूरा कर दिखाया है। उन्होंने केवल अपने घर परिवार और समाज का ही नहीं बल्कि पूरे जिले का नाम रोशन किया है, जो वाकई में काबिल-ए-तारीफ है।

सिपाही से लेकर लेफ्टिनेंट तक के सफर में संघर्षों का किया सामना और अब सबके लिए बन चुके हैं प्रेरणा:
एक सिपाही से लेकर भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद तक का सफर तय करना कोई साधारण बात नहीं है। इस सफर के दौरान उन्होंने जिस तरह के संघर्ष किए, वह वाकई में प्रशंसनीय है। उनका कहना है कि हमें कोई भी मंजिल आसानी से प्राप्त नहीं होती है। उसे पाने के लिए हमें एक लंबा सफर तय करना पड़ता है और उस बीच कई प्रकार की मुश्किलें भी सामने आती है परंतु हमें ऐसे समय में हार मानने के बजाय उन मुश्किलों से लड़नी चाहिए ताकि हम उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। वह कहते हैं कि यदि मन में दृढ़ विश्वास और संकल्प का भाव हो, तो किसी भी लक्ष्य तक पहुंचना संभव है। किसी भी ऊंचे पद पर बैठने के लिए अथवा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए काफी मेहनत, लगन और समर्पण भाव की आवश्यकता होती है। अपने मन में खुद के प्रति विश्वास रखकर हम अपने किसी भी लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं।

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